श्री श्री बूढी माता मंदिर

जनमानस की धार्मिक आस्थाओं का केंद्र : श्री श्री बूढी माता मंदिर

या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी: पापात्मनां कृतधियां ह्दयेषु बुध्दि: श्रध्दा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा,
तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम.. 

– श्री दुर्गासप्तशती चतुर्थोऽध्याय श्लोक क्र. 5

जनमानस की धार्मिक आस्थाओं का केंद्र श्री श्री बूढी माता मंदिर की स्थापना को लेकर कई कथा सामने आती है,    आज भक्तों की अटूट श्रद्धा के रहते् मंदिर एक सिध्द स्थान बन गया. आज यहां पर की गई मनोकामना पूरी होती है. बहुत दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं.

एक किवदंती के अनुसार ग्राम मेहरागांव और इटारसी के मध्यम में गोमती गंगा नदी के किनारे माता खेड़ापति का निवास था। सन 812 में राजस्थान में मुसलमानो का युद्ध हुआ। इस युद्ध के पूर्व कई बंजारे एवं मारवाड़ी राजस्थान से बाहर की ओर चल दिए। जब इन लोगों का जत्था इटारसी से निकला तो इन्होंने जल और खुला मैदान देखकर डेरा डाला। अपने तब्बू लगाएं, इंसानों के साथ ही साथ ऊंट गाडर, बकरी को भी स्थान व पानी की सुविधा मिली। यहां पर इन्होंने अपनी कुलदेवी माताजी चिलासेन को स्थापित किया। जब राजस्थान में लडाई समाप्त हुई, बंजारे वापस गए तब उन्होंने  कुलदेवी को भी ले जाना चाहा। तब माता जी बोली अब मैं यहीं रहूंगी। सभी बंजारों ने मिलकर निर्णय लिया और उन्होंने लखन सिंह बंजारा को देवी की सेवा में छोड़ चले गए। कुछ दिनांें तक लखनसिंह यहां पर रहा, कुछ समझ न आने की वजह से वह सलकनपुर जाकर रहने लगा। वहां  पहाड़ पर अपनी मवेषियो को चराता, इस तरह पूरा परिवार ही माता चिलासेन को भूल गया। परंतु तब भी हर समय कुछ न कुछ मुसीबत उस पर रहती थी। एक दिन स्वप्न में उसे एक कन्या दिखाई दी और बोली कि मैं तेरी कुलदेवी चिलासेन हूं, मुझे वहां अकेली छोड़कर तू भी यहां आ गया। यदि तू नहीं आ सकता, तो वहां मेरा स्थान बना दें। तेरे सारे कार्य ठीक से होने लगेंगे। उन्होंने माता जी से पूछा कि स्थान किस नाम से बनाऊं तब उन्होंने कहा कि पहला नाम मेरा चिलासेन है और दूसरा नाम बीजासेन के नाम से जाना जाये। इस तरह से माता चिलासेन का एक स्थान इटारसी में बनवाया गया।

इस घटना को वर्षों बीत चले, बात अंग्रेजों के समय की है क्योंकि वहां पर जंगल झाड़िया थी इसलिए बहुत कम लोग जाते थे। भारत पर अंग्रेजों का शासन था उस समय मालगुजार हुआ करते थे। यहां भी आसपास के गांवों को मिलाकर एक मालगुजार ठाकुर रघुराजसिंह थे। ठाकुर साहब सिर्फ चैत्र की नवरात्रि में इस स्थान पर पूजा हेतु आते थे। उनके बाद उनकी पत्नि नरवदी बाई सनखेडा मालगुजारन ने आना शुरू किया और रख रखाव, साफ सफाई प्रारंभ की। उस समय मेहरागांव ही एक नजदीक का गांव था। वहां किसान खेती करने आते थे। इस स्थान के मध्य में होने से उन्होंने अपनी श्रद्धा भक्ति से नारियल फोड़ना, अगरबत्ती लगाना शुरू कर दिया। इस स्थान पर लोगों की आस्था बढ़ती गई और फिर कच्ची मिट्टी का चबूतरा बना कर, दो मूर्तिया गोल पत्थर की रखी गई। माता जी कुल देवी चिलासेन का अवतार था उन्हीं की पूजा करते थे लोग प्रसाद चढ़ाते थे एवं कढाई करते थे।

नरबदी बाई ने ही चिलासेन का नाम सन् 1918 में बदलकर बूढ़ी माता रख दिया। तब से यह स्थान बूढ़ी माता के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जीर्णोद्धार

देव नारायणजी पठारिया के पु़त्र हिरजी भाई ने एक दाल मिल नीलकंठ इस क्षेत्र (वर्तमान में मालवीयगंज) में बनाई। उन्होंने माताजी के यहां अपनी श्रद्धा से जाना प्रारंभ किया। सन् 1961 में गोपीलाल अग्रवाल (गप्पा सेठ) ने इस स्थान पर जाकर पूजन शुरू किया। धीरे धीरे लोगों को इस स्थान के विषय में पता लगने लगा। तब भावसार बाबू, गोपीलाल, हीरजी भाई, पगारे जी ने अन्य लोगों के साथ मिलकर इस स्थान पर एक छोटा पक्का चबूतरा बनवा दिया। कुछ दिनों के बाद माता जी कि प्रतिमा लाकर स्थापित कर दी गई। सेठ गोपीलाल जी ने अपनी श्रद्धा से खामगाव सलकनपुर महाराष्ट्र से चांदी का सवा किलो का छत्र चढ़ाया जो कि आज भी मौजूद है। फिर लोगों ने आपस में चंदा कर यज्ञ प्रारंभ हुआ। किंतु कुछ वर्षों के उपरांत बाबूलाल अग्रवाल बड़े मैया ने चंदे से यज्ञ का प्रावधान बंद करवा दिया और आपस में चंदा करके यज्ञ प्रारंभ हुआ।

प्रतिवर्ष जनवरी फरवरी में शतचंड़ी महायज्ञ के नाम से आज तक होता है। मंदिर प्रांगण में माता जी का विशाल मंदिर के अलावा अनेक भगवान के मंदिर, यज्ञ शाला, धर्मशाला आदि हैं। दूर दूर से भक्त आकर माताजी से मन्नत मांगते है और आशीर्वाद से उनका काम हो जाता है।

स्रोत

दादा दरबार घानाबड़ के केशवानंद ब्रम्हचारी

गुरु गौरी शंकर दादा दरबार घानाबड़ मालाखेड़ी

मान्यता के अनुसार पुराने समय में गांव की सीमा के पास खोखला माता या मरई माता या खेडापति माता के नाम से मंदिर स्थापित किये जाते थे. जो कई तरह से उस गांव की रक्षा करते थे. मानना था कि इनमें बसी माता गांव की, चारों दिशाओं से आने वाली बाधाओं से रक्षा करती हैं. इसी तरह बूढी माता मंदिर की शुरूआत में कहा जाता है कि एक छोटी सी मढिया थी, जो मेहरागांव की सीमा होने के कारण खेडापति माता थी. बाद में इन्हीं खेडापति माता का नाम श्रीसप्तशती में 108 देवियों के नामों में से एक नाम वृध्द माता के नाम से ही बूढीमाता नाम हुआ.

इसी प्रकार पुस्तक बूढी माता रहस्यम पुस्तक में इन्हें मां धूमावती माता के रूप में माना गया है. इसके अनुसार बूढी माता, मां पार्वती के महाकाली अवतार का एक उप अवतार है. जिनका प्रकृत्य माता महाकाली का स्वरूप, जो देवासुर संग्राम में असुरों की सेना से देवों की रक्षा के लिए हुआ था. यह एक अवतार माताजी के दस महाविद्या के अवतार में सप्तम महाविद्या माता धूमावती देवी के बूढे स्वरूप का है इसलिए इस अवतार को माता बूढी क़हा गया है. माता बूढी क़े इस स्वरूप के शिव भगवान, अघोर शंकर हैं. जो कि श्मशान में वास करते हैं, इसलिए माता बूढी क़ा वास भी श्मशान में माना गया है और मां की आराधना भगवान अघोर शिव के साथ की जाती है. मां का मंदिर नगर के बाहर श्मशान भूमि के समीप रहता है. सन 1975 में वीरान पडे ऌस स्थान पर निर्जन, सुनसान इलाके में स्थित छोटी सी मढिया के जीर्णोध्दार के मकसद से यहां प्रथम बार श्री शतचंडी महायज्ञ कराने का निर्णय लिया गया.